Saturday, October 17, 2026

प्रशिक्षण समाप्त होते ही शुरू होती है असली परीक्षा

 

प्रशिक्षण समाप्त होते ही शुरू होती है असली परीक्षा

जब किसी व्यक्ति को किसी विशेष कार्य के लिए चुना जाता है, तो कई बार उसके लिए हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। ऐशो-आराम, सुख-सुविधाएँ और आकर्षक वातावरण—किसी भी चीज़ की कमी नहीं रहने दी जाती। उसे विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, मानसिक रूप से तैयार किया जाता है और एक ऐसे स्वप्निल वातावरण में विकसित किया जाता है, जहाँ भविष्य सफलता, उपलब्धियों और संभावनाओं से भरा हुआ दिखाई देता है।

लेकिन वास्तविक परीक्षा तब शुरू होती है, जब प्रशिक्षण देने वाला या नियोजक यह तय करता है कि अब उस व्यक्ति को निर्धारित कार्य में लगाया जाना चाहिए।

उस समय उससे शत-प्रतिशत समर्पण, निष्ठा, आज्ञापालन और अपेक्षित परिणाम की माँग की जा सकती है। अब तक मिली सुविधाएँ, लाभ और प्रशिक्षण उसके ऊपर ऐसी जवाबदेही का दबाव बना सकते हैं, जिसमें अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनना अथवा स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना कठिन हो जाता है।

जब कोई व्यक्ति अपनी अंतरात्मा के निर्देशों के बजाय किसी दूसरे के स्वार्थ का साधन बन जाता है, तब उसके परिणाम केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते; वे समाज और राष्ट्र के लिए भी चिंता का विषय बन सकते हैं।

इतिहास हमें सिखाता है कि बाहरी चमक-दमक, प्रशिक्षण की भव्यता और सुविधाओं की प्रचुरता किसी व्यक्ति अथवा व्यवस्था के वास्तविक उद्देश्यों को समझने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इसलिए हमारा मार्ग स्पष्ट होना चाहिए—भावनाओं के स्थान पर तथ्य, अटकलों के स्थान पर प्रमाण और अंधविश्वास के स्थान पर विवेकपूर्ण मूल्यांकन।

आज भारत अपने राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए अधिक सतर्क और सक्षम बन रहा है। जहाँ विश्वसनीय प्रमाणों से यह स्थापित हो कि कोई व्यक्ति या संगठन भारत के हितों के विरुद्ध कार्य कर रहा है, वहाँ कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करना राष्ट्र का दायित्व है। साथ ही, प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों, न्याय और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है।

हमारा आत्मविश्वास मजबूत संस्थाओं, दक्षता, सतर्कता, राष्ट्रीय एकता और सत्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता पर आधारित होना चाहिए।

भारत भय के कारण पीछे नहीं हटेगा। भारत तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर निर्णय लेगा, तैयारी के माध्यम से अपनी शक्ति बढ़ाएगा और एकजुट संकल्प के साथ आगे बढ़ेगा।

हम विजय प्राप्त करेंगे—भावनाओं के आवेग से नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता और विवेक से; विभाजन के रास्ते पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता की शक्ति से; और अन्याय का अनुसरण करके नहीं, बल्कि न्याय तथा संविधान की गरिमा की रक्षा करके।

भारत विजयी होगा। भारत का आत्मसम्मान अक्षुण्ण रहेगा। भारत के राष्ट्रीय हित सुरक्षित रहेंगे।

जय हिंद! वन्दे मातरम्!

— अशोक कुमार सिंह
अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, कलकत्ता

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