“त्यागात् शान्तिरनन्तरम्” — त्याग के पश्चात् ही शान्ति है
मनुष्य के जीवन में अशान्ति का सबसे बड़ा कारण परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी हुई हमारी अपेक्षाएँ, आसक्तियाँ और इच्छाएँ हैं। हम व्यक्तियों, वस्तुओं, पद, प्रतिष्ठा, धन, सम्बन्धों और परिणामों को अपने अनुसार बनाए रखना चाहते हैं। जब वास्तविकता हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं होती, तब मन में निराशा, क्रोध, भय, ईर्ष्या और बेचैनी उत्पन्न होती है। इसलिए श्रीमद्भगवद्गीता का यह अमर संदेश है— “त्यागात् शान्तिरनन्तरम्”, अर्थात् त्याग के बाद तत्काल शान्ति की प्राप्ति होती है।
यहाँ त्याग का अर्थ संसार, परिवार अथवा अपने कर्तव्यों को छोड़ देना नहीं है। वास्तविक त्याग है—अपने कर्मों के परिणाम पर अधिकार जताना छोड़ देना; अनावश्यक अपेक्षाओं, अहंकार, मोह, द्वेष, लोभ और प्रतिशोध की भावना से स्वयं को मुक्त करना। मनुष्य को अपना कर्म पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण के साथ करना चाहिए, लेकिन उसके फल को लेकर चिन्ता में नहीं डूबना चाहिए। फल सदैव समय, परिस्थिति और परमात्मा की व्यवस्था के अनुसार प्राप्त होता है।
जब हम किसी व्यक्ति से अत्यधिक अपेक्षा रखते हैं, तब उसके व्यवहार से हमें दुःख पहुँचता है। जब हम धन और प्रतिष्ठा को स्थायी मान लेते हैं, तब उनके खोने का भय हमें परेशान करता है। जब हम बीती हुई घटनाओं को बार-बार स्मरण करते हैं, तब हमारा वर्तमान भी अशान्त हो जाता है। परन्तु जिस क्षण हम स्वीकार कर लेते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति परिवर्तनशील है, उसी क्षण मन का बोझ हल्का होने लगता है।
त्याग हार नहीं, बल्कि आत्मविजय है। क्षमा करना दुर्बलता नहीं, मन की महानता है। जो बीत चुका है उसे छोड़ देना पलायन नहीं, बल्कि वर्तमान को सुन्दर बनाने की बुद्धिमत्ता है। कभी-कभी हमें दूसरों को नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, आग्रह और पीड़ा को छोड़ना पड़ता है। यही आन्तरिक त्याग मनुष्य को वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान करता है।
सच्ची शान्ति संसार को अपने अनुसार बदलने में नहीं, बल्कि सत्य को स्वीकार करते हुए अपने मन को स्थिर रखने में है। जब कर्म में निष्ठा, हृदय में प्रेम, व्यवहार में करुणा और परिणामों के प्रति अनासक्ति होती है, तब जीवन सरल और शान्त हो जाता है।
अतः जीवन का सार यही है—
कर्तव्य करते रहिए, परन्तु फल की चिन्ता छोड़ दीजिए; प्रेम कीजिए, पर अधिकार मत जताइए; सम्बन्ध निभाइए, पर अपेक्षाओं का बोझ मत रखिए; और जो आपके नियन्त्रण में नहीं है, उसे परमात्मा को समर्पित कर दीजिए। क्योंकि जहाँ मोह और आग्रह का त्याग होता है, वहीं से अनन्त शान्ति का आरम्भ होता है।
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