“अपमान को निगल जाना चरित्र की महानता नहीं, बल्कि पतन की अंतिम सीमा है।”
मनुष्य जीवन में अनेक कठिनाइयों, मतभेदों और कटु परिस्थितियों का सामना करता है। सहनशीलता निश्चय ही एक महान गुण है, परंतु सहनशीलता और आत्मसम्मानहीनता में बहुत बड़ा अंतर है। शांति बनाए रखने के लिए कभी-कभी मौन रहना बुद्धिमानी हो सकती है, लेकिन बार-बार किए गए अपमान को चुपचाप स्वीकार करना धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्मविश्वास, स्वाभिमान और व्यक्तित्व को समाप्त कर देता है।
क्षमा करना उदारता है, परंतु अन्याय सहते रहना कमजोरी बन सकती है। यदि कोई व्यक्ति हमारी विनम्रता को विवशता समझने लगे, हमारे मौन का अनुचित लाभ उठाए और निरंतर हमारी गरिमा को ठेस पहुँचाए, तो उसके विरुद्ध सम्मानजनक, संयमित और स्पष्ट आवाज उठाना आवश्यक है। आत्मसम्मान की रक्षा करना अहंकार नहीं है; यह प्रत्येक मनुष्य का नैतिक अधिकार और कर्तव्य है।
जहाँ अपमान को सामान्य मान लिया जाता है, वहाँ अन्याय को बढ़ावा मिलता है। इसलिए आवश्यकता पड़ने पर सीमाएँ निर्धारित करनी चाहिए, अनुचित व्यवहार का प्रतिरोध करना चाहिए और विषाक्त संबंधों से स्वयं को दूर कर लेना चाहिए। हमारा विरोध प्रतिशोध या क्रोध से नहीं, बल्कि सत्य, विवेक और मर्यादा से प्रेरित होना चाहिए।
जीवन में झुकना विनम्रता हो सकती है, परंतु इतना भी नहीं झुकना चाहिए कि व्यक्ति अपनी पहचान और गरिमा ही खो दे। संसार में वही व्यक्ति वास्तविक सम्मान प्राप्त करता है, जो दूसरों का सम्मान करता है और अपने आत्मसम्मान के साथ भी कभी समझौता नहीं करता। अतः अपमान को भाग्य मानकर निगलते रहना उचित नहीं; सही समय पर शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहना चाहिए—“मैं विनम्र अवश्य हूँ, परंतु सम्मानहीन नहीं।”
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