“भवतः अपेक्षया उत्तमः भागीदारः नास्ति।”
स्वयं से बढ़कर कोई हमसफ़र नहीं
मनुष्य अपने जीवन में अनेक रिश्तों से जुड़ता है। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, जीवनसाथी, संतान और सहकर्मी—सभी हमारी जीवन-यात्रा के महत्त्वपूर्ण साथी होते हैं। कोई हमें प्रेम देता है, कोई प्रेरणा, कोई अनुभव और कोई कठिन परिस्थितियों के माध्यम से जीवन का सत्य सिखाता है। परन्तु इन सभी संबंधों के बीच एक ऐसा साथी है, जो जन्म से लेकर अंतिम श्वास तक हमारे साथ रहता है—और वह है हमारा स्वयं का अस्तित्व।
दुनिया के लोग परिस्थितियों के अनुसार हमारे निकट आते हैं और कभी-कभी दूर भी चले जाते हैं। समय बदलता है, संबंधों का स्वरूप बदलता है और प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैं। किन्तु हमारे सुख-दुःख, संघर्ष, आशा, निराशा, सफलता और असफलता का वास्तविक साक्षी हमारा अपना अन्तर्मन ही होता है। जब कोई हमारी पीड़ा नहीं समझ पाता, तब भी हमारा मन उसे जानता है। जब हमारे आँसू दुनिया से छिपे रहते हैं, तब भी हमारी आत्मा उनका भार अनुभव करती है।
स्वयं से बढ़कर कोई हमसफ़र नहीं—इस कथन का अर्थ स्वार्थी अथवा अकेला हो जाना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है स्वयं को समझना, स्वीकार करना और अपना सम्मान करना। जो व्यक्ति अपनी क्षमताओं और कमजोरियों को स्वीकार कर लेता है, वह बाहरी प्रशंसा पर निर्भर नहीं रहता। वह अपनी कमियों को छिपाने के बजाय उन्हें सुधारता है और अपनी सफलताओं पर अहंकार करने के बजाय उनसे प्रेरणा प्राप्त करता है।
जीवन के कठिन मार्गों पर दूसरों का सहयोग महत्त्वपूर्ण होता है, परन्तु अंतिम निर्णय हमें स्वयं ही लेना पड़ता है। संकट के समय साहस अपने भीतर से उत्पन्न करना पड़ता है। असफलता के बाद स्वयं को उठाना पड़ता है और निराशा के अन्धकार में आशा का दीपक भी अपने ही हृदय में जलाना पड़ता है। कोई हमारा मार्ग दिखा सकता है, पर उस मार्ग पर कदम हमें स्वयं ही बढ़ाने होते हैं।
इसलिए अपने साथ मित्रता करना सीखिए। अपनी गलतियों के लिए स्वयं को निरन्तर दोषी ठहराने के बजाय उनसे शिक्षा लीजिए। अपने अतीत को स्वीकार कीजिए, वर्तमान का सम्मान कीजिए और भविष्य के प्रति विश्वास रखिए। दूसरों की स्वीकृति प्राप्त करने की दौड़ में अपनी पहचान मत खोइए। संसार आपको जितना समझे, उससे अधिक आवश्यक यह है कि आप स्वयं को कितनी गहराई से समझते हैं।
जो व्यक्ति अपने भीतर शान्ति, आत्मविश्वास और संतोष विकसित कर लेता है, वह अकेलेपन से भयभीत नहीं होता। वह संबंधों को आवश्यकता या निर्भरता के कारण नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और स्वतंत्रता के साथ निभाता है। ऐसा व्यक्ति किसी का हाथ पकड़ता अवश्य है, परन्तु अपनी यात्रा का सम्पूर्ण भार किसी दूसरे पर नहीं डालता।
अतः स्वयं को कमजोर मत समझिए। अपने मन की सुनिए, अपनी आत्मा का सम्मान कीजिए और अपने भीतर छिपे साहस को पहचानिए। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि आपका स्वयं पर विश्वास बना हुआ है, तो कोई भी कठिनाई आपको स्थायी रूप से पराजित नहीं कर सकती।
आप स्वयं अपने सबसे विश्वसनीय मित्र, सबसे निकट सहयोगी और जीवन-यात्रा के सबसे स्थायी हमसफ़र हैं। संसार साथ दे तो उसका आभार मानिए; यदि कोई साथ छोड़ दे तो निराश मत होइए—क्योंकि जब तक आप स्वयं के साथ खड़े हैं, तब तक आप वास्तव में कभी अकेले नहीं हैं।
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