शत्रु का नाश स्वयं होता है…
शत्रु का नाश करने के लिए सदैव अस्त्र उठाना आवश्यक नहीं होता। कई बार मनुष्य का अहंकार, छल, द्वेष, अन्याय और अधर्म ही उसके विनाश का कारण बन जाते हैं। जो व्यक्ति दूसरों के लिए षड्यंत्र रचता है, वह अनजाने में अपने ही पतन की नींव रख रहा होता है। जो किसी और के मार्ग में काँटे बिछाता है, समय आने पर वही काँटे उसके अपने कदमों को घायल करते हैं।
प्रकृति और समय का न्याय अत्यंत सूक्ष्म, किन्तु अटल है। मनुष्य संसार की अदालत से बच सकता है, प्रमाणों को छिपा सकता है और कुछ समय के लिए असत्य को सत्य के रूप में प्रस्तुत भी कर सकता है; परन्तु वह अपने कर्मों के परिणाम से कभी नहीं बच सकता। कर्म का विधान न किसी प्रभाव को पहचानता है, न पद को और न ही धन को। वह प्रत्येक व्यक्ति को उसके आचरण के अनुसार फल प्रदान करता है।
इसलिए शत्रु से प्रतिशोध लेने में अपनी शक्ति, समय और मानसिक शांति नष्ट नहीं करनी चाहिए। धैर्य रखिए, सत्य के मार्ग पर चलते रहिए और अपने कर्मों को पवित्र बनाए रखिए। आपका संयम आपकी सबसे बड़ी शक्ति है, आपका चरित्र आपका सबसे प्रभावशाली उत्तर है और आपकी सफलता आपके विरोधियों के लिए सबसे स्पष्ट संदेश है।
जब कोई व्यक्ति द्वेष से प्रेरित होकर दूसरों को गिराने का प्रयास करता है, तब वह स्वयं नैतिक रूप से गिरने लगता है। उसका क्रोध उसकी बुद्धि को नष्ट करता है, अहंकार विवेक को समाप्त करता है और निरंतर षड्यंत्र अंततः उसी को अपने जाल में फँसा देता है। अधर्म कुछ समय तक शक्तिशाली दिखाई दे सकता है, परन्तु उसकी जड़ें खोखली होती हैं। सत्य भले ही धीरे चलता हो, लेकिन अंततः विजय उसी की होती है।
अतः शत्रु के विनाश की कामना मत कीजिए। उसे उसके कर्मों और समय के न्याय पर छोड़ दीजिए। अपने हृदय में घृणा रखने से शत्रु का नहीं, बल्कि अपनी शांति का नाश होता है। क्षमा का अर्थ कमजोरी नहीं है; क्षमा उस आत्मविश्वास का प्रतीक है जिसमें मनुष्य जानता है कि न्याय का अंतिम निर्णय समय और कर्म स्वयं करेंगे।
शत्रु का नाश आपके हाथों से नहीं, उसके अपने अहंकार, अन्याय और दुष्कर्मों से होता है। इसलिए प्रतिशोध नहीं—धैर्य रखिए; विवाद नहीं—विवेक रखिए; और घृणा नहीं—अपने लक्ष्य पर विश्वास रखिए। समय मौन अवश्य रहता है, परन्तु जब निर्णय देता है, तब किसी प्रमाण और किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं रहती।
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