जब शोर का असर समाप्त होने लगे
राजनीतिक माहौल में शायद कुछ बदलाव दिखाई देने लगा है।
जिसे कभी बहुत ऊँची आवाज़ में अपनी बात रखने वाली “हल्ला ब्रिगेड” कहा जा सकता है, उनके चेहरों पर अब चिंता और निराशा की झलक दिखाई देती है। जो आत्मविश्वास पहले उनके वक्तव्यों और नारों में दिखाई देता था, वह अब कुछ हद तक धीमा पड़ता हुआ प्रतीत हो रहा है।
चेहरों पर उदासी है,
बॉडी लैंग्वेज में आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है,
और राजनीतिक शोर का प्रभाव भी पहले जैसा दिखाई नहीं देता।
लगातार दोहराए गए आरोप, दावे और कथाएँ अंततः तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर ही परखी जाती हैं।
यदि किसी राजनीतिक नैरेटिव में अतिशयोक्ति, भ्रम या तथ्यों की गलत प्रस्तुति हो, तो समय के साथ उसकी वास्तविकता सामने आना स्वाभाविक है। केवल किसी बात को बार-बार कह देने से वह सत्य नहीं बन जाती।
सत्य को प्रमाण की आवश्यकता होती है;
असत्य को केवल शोर की।
शायद यही कारण है कि आज अनेक लोग शांत होकर परिस्थितियों को देख रहे हैं।
जो बातें कल तक बहुत जोर से कही जा रही थीं, आज उन्हीं बातों पर प्रश्न उठ रहे हैं।
जो दावे कभी अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत किए जा रहे थे, अब उन्हें तथ्यों और परिस्थितियों के सामने परखा जा रहा है।
और जब किसी राजनीतिक प्रचार का आधार वास्तविकता की कसौटी पर कमजोर पड़ता है, तो उसका प्रभाव भी स्वाभाविक रूप से कम हो सकता है।
अब जनता केवल सुनना नहीं चाहती।
जनता देख रही है।
जनता समझ रही है।
जनता प्रश्न कर रही है।
जनता तुलना कर रही है।
और अंततः लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जनता की ही होती है।
इसी संदर्भ में न्यूटन के तृतीय नियम का स्मरण होता है—
“प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।”
राजनीतिक जीवन में भी इसे एक रूपक के रूप में समझा जा सकता है।
हर राजनीतिक कार्रवाई की कोई न कोई प्रतिक्रिया होती है।
हर निर्णय का कोई न कोई परिणाम होता है।
हर आरोप का उत्तर आता है।
हर प्रचार के सामने तथ्य अपनी जगह बनाते हैं।
और जनता के बीच लगातार चलाए गए किसी भी नैरेटिव का अंततः सामना जनमत से होता है।
इसलिए अब शायद आवश्यकता अधिक शोर की नहीं, बल्कि तथ्यों के सामने आने की है।
आरोप लगाए जा चुके हैं।
प्रचार हो चुका है।
दावे किए जा चुके हैं।
अब समय है कि तथ्य स्वयं बोलें।
लंबे समय तक राजनीतिक शोर किया जा सकता है, लेकिन जनता की स्मृति और लोकतंत्र का निर्णय केवल शोर पर निर्भर नहीं करता।
शायद इसी कारण आज कुछ चेहरों पर चिंता दिखाई दे रही है और कुछ राजनीतिक शरीर-भाषा में पहले जैसी दृढ़ता दिखाई नहीं देती।
अब लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं—
क्या होगा उस क्रिया का, जिसकी प्रतिक्रिया अब सामने आने वाली है?
शायद अब समय है कि न्यूटन का तृतीय नियम अपना राजनीतिक रूपक पूरा करे।
जय हिन्द। 🇮🇳
अशोक कुमार सिंह
अधिवक्ता, हाई कोर्ट कलकत्ता
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