Sunday, August 30, 2026

आत्मबोध दुर्बल मन से सम्भव नहीं

 

आत्मबोध दुर्बल मन से सम्भव नहीं

“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः”मुण्डक उपनिषद् 3.2.4

आत्मज्ञान किसी शारीरिक शक्ति से नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता, आत्मसंयम, सत्यनिष्ठा और निरन्तर साधना से प्राप्त होता है। यहाँ “बल” का अर्थ उस आन्तरिक सामर्थ्य से है, जो मनुष्य को भय, मोह, आलस्य, अहंकार और प्रलोभन पर विजय पाने में सहायता करता है।

जो व्यक्ति कठिनाइयों से घबराकर अपने आदर्श छोड़ देता है, वह आत्मतत्त्व को नहीं पहचान सकता। आत्मबोध के लिए अपनी कमजोरियों का सामना करने, मन को अनुशासित करने और सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहने का साहस आवश्यक है।

आत्मा की प्राप्ति संसार को जीतने से नहीं, स्वयं की दुर्बलताओं पर विजय पाने से होती है।

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